Saturday, May 11, 2019

रमजान माह में एक नेकी बदले मिलता है सत्तर नेकियों का सवाब-मुफ्ती साजिद हसनी

ब्रहमपाल सिंह यादव (NNI Coverage) 
पीलीभीत यूपी। रमजान का पाक महीना शुरू हो गया है जहां इस महीने में खुदा ऐ ताला रोजेदार पर अपनी रहमतों की बारिश करता है और यह माह समूची मानव जाति को प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश भी देता है।

            इस पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों का खजाना लुटाता है और भूखे-प्यासे रहकर खुदा की इबादत करने वालों के गुनाह माफ हो जाते हैं। इस माह में दोजख (नरक) के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत की राह खुल जाती है।इस माहे रमजान के बारे में नगर के प्रसिद्ध कादरी दारूल इफ्ताह के मुफ्ती व काजी इस्लामिक स्कालर हजरत अल्लामा मुफ्ती मोहम्मद साजिद हसनी कादरी ने बताया कि रोजा अच्छी जिंदगी जीने का प्रशिक्षण है जिसमें इबादत कर खुदा की राह पर चलने वाले इंसान का जमीर रोजेदार को एक नेक इंसान के व्यक्तित्व के लिए जरूरी हर बात की तरबियत देता है।
             उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया की कहानी भूख, प्यास और इंसानी ख्वाहिशों के गिर्द घूमती है और रोजा इन तीनों चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना है। रमजान का महीना तमाम इंसानों के दुख-दर्द और भूख-प्यास को समझने का महीना है ताकि रोजेदारों में भले-बुरे को समझने की सलाहियत पैदा हो।उन्होंने बताया कि रोजे के दौरान झूठ बोलने, चुगली करने, किसी पर बुरी निगाह डालने, किसी की निंदा करने और हर छोटी से छोटी बुराई से दूर रहना अनिवार्य है।मुफ्ती साजिद हसनी कादरी ने कहा कि रोजे रखने का असल मकसद महज भूख-प्यास पर नियंत्रण रखना नहीं है बल्कि रोजे की रूह दरअसल आत्म संयम, नियंत्रण, अल्लाह के प्रति अकीदत और सही राह पर चलने के संकल्प और उस पर मुस्तैदी से अमल में बसती है।उन्होंने कहा कि दुनिया के लिए रमजान का महीना इसलिए भी अहम है क्योंकि अल्लाह ने इसी माह में हिदायत की सबसे बड़ी किताब यानी कुरान शरीफ का दुनिया में अवतरण शुरू किया था।
           रहमत और बरकत के नजरिए से रमजान के महीने को तीन हिस्सों (अशरों) में बाँटा गया है। इस महीने के पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने रोजेदार बंदों पर रहमतों की बारिश करता है।दूसरे अशरे में अल्लाह रोजेदारों के गुनाह माफ करता है और तीसरा अशरा दोजख की आग से निजात पाने की साधना को समर्पित किया गया है।     
           हजरते फातिमा महिलाओं के लिए आदर्श _मुफ्ती साजिद हसनी मदीना मस्जिद में चल रहे शरई अहकाम दर्स के दौरान रविवार को रमजान के फजाइल के साथ साथ हजरत फातिमा की जिन्दगी पर रोशनी डाली गई मुफ्ती साजिद हसनी कादरी ने कहा कि हजरत फातिमा तमाम महिलाओं के लिए आदर्श हैं उन से पेरेणा लेकर मुस्लिम महिलाएं दीन व दुनिया को गुलजार बना सकती हैं उन्होंने कहा कि हजरत फातिमा सादगी की मिसाल थी। मुफ्ती नूर मोहम्मद हसनी कादरी ने कहा कि सदका ए फित्र अदा करना वाजिब (जरूरी) है जो व्यक्ति इतना मालदार है कि उस पर जकात वाजिब है तो उसे अपनी जकात के साथ साथ व अपनी नाबालिग औलाद की तरफ से सदका ए फित्र देना जरूरी है उसके वाजिब होने की तीन शर्तें हैं 1 -आजाद होना .2-मुसलमान होना 3_किसी ऐसे माल के मात्रा का मालिक होना जो असली जरूरत से ज्यादा हो तो उस माल पर साल गुजरना शर्त नहीं है और न ही माल का तिजारती होना है यहाँ तक कि नाबालिग और वह बच्चें ईद के दिन (तुलू ए आफताब) सूरज निकलने से पहले पैदा हुए हों और मजनूनो पर भी सदका ए फित्र निकालना बाजिब ( जरूरी ) है सदका ए फित्र के तौर पर 2.45 किलोग्राम गेहूं या उसके आटा की कीमत अदा की जाती है बेहतर है कि कीमत अदा करे इस बक्त एक व्यक्ति पर लगभग 40 रुपये सदका ए फित्र बन रहा है लिहाजा जो उसके हकदार हैं जैसे गरीब यतीम बे सहारे उन तक रकम पहुंचा दी जाए ताकि वह जरूरत मन्द लोग अपनी अपनी जरूरते अपने वक्त पर पुरी कर सके जब तक सदका ए फित्र अदा नहीं किया जाता है तब तक सारी इबादते व रोजे जमीन आसमान के बीचो बीच लटकती रहती हैं इसे अदा करने के वाद इबादते बारगाहे इलाही में पहुंच जाती है और रोजे व इबादतो में किसी किस्म कमी रह जाती है तो सदका ए फित्र उसे पुरी कर देता है।

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