Sunday, August 25, 2024

हसरत मोहानी की याद में शारिक रब्बानी के आवास पर गोष्ठी व नशिस्त

डी०पी०श्रीवास्तव (NNI Coverage समाचार सेवा)

नानपारा, बहराइच (उ०प्र०)। मशहूर शायर, साहित्यकार व समाजसेवी शारिक रब्बानी के नानपारा स्थित आवास पर भारतीय सांस्कृतिक सहयोग एवं मैत्री संघ उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में याद-ए-हसरत गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता , भारतीय सांस्कृतिक सहयोग एवं मैत्री संघ उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष शायर शारिक रब्बानी ने की, विष्टि अतिथि ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव एडवोकेट और साहित्यकार हुस्न तबस्सुम निहां रहीं। गोष्ठी का संचालन रोशन ज़मीर ने किया। 

इस अवसर पर शायर शारिक रब्बानी ने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक सहयोग एवं मैत्री संघ (इस्कफ) उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में महान स्वतंत्रता सेनानी, शायर व समाज सेवी मौलाना हसरत मोहानी की याद में याद-ए-हसरत गोष्ठी का आयोजन किया गया है। मौलाना हसरत मोहानी का जन्म मोहान जिला उन्नाव में हुआ था। वह हमारे देश के एक ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी, शायर व समाज सेवी थे जिन्होंने हमेशा मज़लूमो और सच्चाई का साथ दिया। उन्होंने सर्वप्रथम इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया, वह भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाले पहले व्यक्ति थे। संविधान सभा के सदस्य थे। हसरत पत्रकार, समाज सेवी तथा कई राजनीतिक पार्टियों के सदस्य व पदाधिकारी भी रहे थे। उन्होंने पाकिस्तान बनने का विरोध किया और भारत में ही रहे। शायरी भी उनकी बेमिसाल थी। वह हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। साथ ही उनकी रचनाओं में श्री कृष्ण से भी उनका प्रेम देखने को मिला। उन्होंने भगवान कृष्ण की शान में भी बहुत सी रचनाएं लिखी है।और हमेशा देश और समाज ‌के लिए काम किया, मज़दूरों ‌और‌ मज़लूमो के हक़ की आवाज बुलंद की, प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक गुलाम अली द्वारा गाई गई "चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है" भी हसरत मोहानी की ही ग़ज़ल है जो बहुत पसंद की जाती है। श्री रब्बानी ने आगे कहा कि हम लोगों को भी उनके विचारों और कार्यो से प्रेरणा लेनी चाहिए और देश व समाज के लिए काम करना चाहिए। साथ ही मौलाना हसरत मोहानी को सामाजिक व साहित्यिक योगदान के लिए याद रखना चाहिए। 

गोष्ठी में विभिन्न शायरों के अतिरिक्त पत्रकार व अन्य श्रोतागण भी उपस्थित रहे। संचालक ने हसरत मोहानी के कलाम का इस्तेमाल करते हुए गोष्ठी का संचालन किया तथा शायरों ने अपने कलाम भी पढ़ें। अय्यूब नानपारवी ने पढ़ा "गुल मोहब्बत के खिलाते हैं खिलाते रहिए, आप उस शोख से नज़रों को मिलाते रहिये।" सफीर नानपारवी ने पढ़ा "दूर दुनिया बसाने की खातिर, चांद पर लोग जाने लगे हैं।" एडवोकेट ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव ने पढ़ा "वो मौज में रहते होंगे अंकुर कभी कभी, सुबह हुई तो क्यूं मेरी कब्र पर खड़े रहे।" ज़मीर नानपारवी ने देशप्रेम पर नज़्म पढ़ी "गुरू ग्रन्थ गीता कुरान है देते ईश सन्देश, ऐसा मेरा देश है यारो ऐसा मेरा देश।" कैफ़ नानपारवी ने पढ़ा "बचाया जा न सके जो कभी बचाने से, मकान रेत पे क्या फायदा बनाने से।" शम्स नानपारवी ने पढ़ा "सच पूछिए तो आपने काबा को ढा दिया, दिल तोड के जनाब ने अच्छा नहीं किया।" शारिक रब्बानी ने पढ़ा "प्रेम के गीत लिखूं लिख़ के तेरे नाम करूं, कभी राधा कभी मीरा को मैं प्रणाम करूं।" शकील अंसारी मकी ने पढ़ा "इंसा मुसाफिर है चलता रहेगा, निज़ाम ए ज़माना बदलता रहेगा।" गोष्ठी में सरफराज अहमद सिद्दीकी, चन्द्र भाल व अबरार आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

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