ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव (ब्यूरो/संचालक NNI Coverage)
बहराइच, उ०प्र०। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (2014 - 2017) के सेवानिवृत महानिदेशक डॉ० राकेश तिवारी ने नवल न्यूज एंड इन्वेस्टीगेशन समाचार सेवा के बहराइच ब्यूरो एडवोकेट ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव से नानपारा में अपने विचार व यात्रा अनुभव साझा किये। श्री तिवारी ने बताया कि वह वर्ष 1988 से 2013 तक उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में 2 अक्टूबर 1953 को हुआ था और बचपन वहीं बिसवां में ही बीता। वैसे ये मूल निवासी उत्तर-प्रदेश के बस्ती ज़िला के हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विषय में स्नातकोत्तर के बाद उन्होंने मिर्जापुर के चित्रित शैलाश्रयों पर अवध विश्वविद्यालय से पीएचडी की। उन्हें लगभग चार दशक तक देश के विभिन्न भागों में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण एवं उत्खनन तथा गंगा-घाटी को दक्षिण भारत से जोडऩे वाले प्राचीन ‘दक्षिणा-पथ’ की यात्रा एवं गहन अध्ययन का अनुभव है। उनके तद्विषयक दो सौ से अधिक शोध-पत्र, रिपोर्ट आदि प्रकाशित होते रहे हैं। पूर्व महानिदेशक श्री तिवारी भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पद से सेवानिवृत्त हुए। वह घूमने और लिखने में सहज रुचि रखते हैं। उन्होंने कई देशों की यात्राएँ की हैं।
NNI Coverage से श्री तिवारी ने अपना साहित्यिक परिचय साझा करते हुए कहा कि उनके लखनऊ से काठमांडू तक साइकिल से यात्रा पर आधारित यात्रा-वृत्तांत ‘पहियों के इर्द-गिर्द’; दिल्ली से कलकत्ता तक की नौका-यात्रा पर आधारित यात्रा-वृत्तांत ‘सफ़र एक डोंगी में डगमग’; उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भू-भाग के सर्वेक्षण एवं सैर पर आधारित संस्मरण ‘पवन ऐसा डोलै’ तथा समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी प्रकाशित होते रहे हैं। इसके अलावा श्री तिवारी ने अपने मुख्य पुरातात्विक योगदान से यह प्रदर्शित किया कि भारतीय उपमहाद्वीप में चावल की खेती 9वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व में लहुरादेवा नामक स्थान पर की जाती थी। उन्होंने मध्य गंगा के मैदानों में लोहे के उपयोग पर भी शोध किया है। उन्होंने बताया कि लद्दाख में खनन के दौरान प्रागैतिहासिक शिविर स्थल मिला। अयोध्या में विवादित स्थल पर भी उनका 'काम' काफ़ी महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसके साथ ही उन्होंने मानव रॉक आर्ट साइट्स के लिए भी खासा योगदान दिया है। श्री तिवारी ने अपने यात्रा वृत्तान्त पर हृदय उदगार प्रकट करते हुए NNI Coverage से कहा कि 'पाहियों के इर्द गिर्द' के द्वितीय संस्करण के लिए राजकमल प्रकाशन के आग्रह पर उन्होंने 1974 से 2024 के बीच के 50 वर्षों के अंतराल में हुए परिवर्तन को पाठकों के बीच रखना चाहते हैं जैसा कि प्रथम बार वह लखनऊ से काठमांडू साईकिल से गए थे जबकि इस बार वह ये द्वितीय यात्रा कार से कर रहे हैं, दोनों यात्राएं स्वयं में काफी दिलचस्प हैं।

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