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"सर्वपितृ अमावस्या पर 11 साल बाद गजछाया योग, कर लें ये शुभ काम"

ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव (संचालक NNI coverage) इस बार पितृ पक्ष 20 सितंबर 2021, सोमवार से प्रारंभ हुआ हैं और अब इसका समापन 6 अक्टूबर 2021, बुधवार को आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि अर्थात सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या को होगा। इस बार इस दिन 11 साल बाद गजछाया योग बना रहा है। इस दिन कुमार योग और सर्वार्थसिद्धि योग भी है। इस दिन सूर्य, चंद्रमा, मंगल और बुध ग्रह मिलकर कन्या राशि में चतुर्ग्रही योग बना रहे हैं। ऐसे में कुतुप काल में श्राद्ध करना अत्यंत ही चमत्कारिक फल देने वाला होगा।

1. छह अक्‍टूबर को सूर्य और चंद्रमा दोनों ही सूर्योदय से लेकर शाम 04:34 बजे तक हस्त नक्षत्र में होंगे। अमावस्या के दिन यह विशिष्ट योग सूर्योदय से शाम के करीब 04:34 बजे तक रहेगा। यह स्थिति को ही गजछाया योग कहते हैं। यह भी कहा जाता है कि जब सूर्य हस्त नक्षत्र पर हो और त्रयोदशी के दिन मघा नक्षत्र होता है तब 'गजच्छाया योग' बनता है।

2. शास्त्रों के अनुसार इस योग में श्राद्ध कर्म अर्थात तर्पण, पिंडदान, पंचबलि कर्म, ब्राह्मण भोज, घी मिली हुई खीर का दान, वस्त्र आदि कर्म करने से पितृ प्रसन्‍न होकर आशीवार्द देते हैं। यह योग उनकी मुक्ति और तृप्ति के लिए उत्तम योग है। कहते हैं कि गजछाया योग में किए गए श्राद्ध और दान से पितरों की अगले 12 सालों के लिए क्षुधा शांत हो जाती है। यह श्राद्धकर्म के लिए अत्यन्त शुभ योग है। इसमें किए गए श्राद्ध का अक्षय फल होता है।

3. इस योग में श्राद्ध कर्म और पितृ पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहती है। पितृपक्ष में गजछाया योग होने पर तर्पण और श्राद्ध करने से वंश वृद्धि, धन संपत्ति और पितरों से मिलने वाले आशीर्वाद प्राप्त होता है।

4. कहते हैं कि जो पितृ उनकी तिथि पर नहीं आ पाते हैं या जिन्हें हम नहीं जानते हैं उन भूले-बिसरे पितरों का भी इसी दिन श्राद्ध करते हैं। अत: इस दिन श्राद्ध जरूर करना चाहिए।

5. अगर कोई श्राद्ध तिथि में किसी कारण से श्राद्ध न कर पाया हो या फिर श्राद्ध की तिथि मालूम न हो तो सर्वपितृ श्राद्ध अमावस्या पर श्राद्ध किया जा सकता है। मान्यता है कि इस दिन सभी पितर आपके द्वार पर उपस्थित हो जाते हैं।

6. सर्वपितृ अमावस्या पर पंचबलि कर्म के साथ ही पीपल की सेवा और पूजा करने से पितृ प्रसन्न होते हैं। स्टील के लोटे में, दूध, पानी, काले तिल, शहद और जौ मिला लें और पीपल की जड़ में अर्पित कर दें। शास्त्र कहते हैं कि "पुन्नामनरकात् त्रायते इति पुत्रः" जो नरक से त्राण (रक्षा) करता है वही पुत्र है। इस दिन किया गया श्राद्ध पुत्र को पितृदोषों से मुक्ति दिलाता है। (03 अक्टूबर 2021 रविवार)




"एक देश के दो विधान, अलगाववादी राजनीति"

ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव (संचालक NNI Coverage) 

ऐसा बार-बार क्यों होता है कि अदालतें हिंदू त्योहारों के प्रति एक रवैया अपनाती हैं और दूसरे त्योहारों के प्रति दूसरा?

क्या देश में दो विधान हैं? एक हिंदुओं के लिए और दूसरा बाकी पंथों को मानने वालों के लिए? यह सवाल देश की बहुसंख्यक आबादी के मन में बार बार उठता है। यह धारणा किसी नेता के कहने से नहीं अदालतों और सरकारों के समय-समय पर किए गए निर्णयों और कामों से बनती है। नेता उसके बाद आते हैं। ताजा संदर्भ देश की सर्वोच्च अदालत के रवैये का है। उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा पर एक रुख और केरल में बकरीद पर बाजार खोलने के केरल सरकार के फैसले को लेकर दूसरा रुख। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। कोरोना महामारी का खतरा अभी टला नहीं है। अब तीसरी लहर की आशंका बढ़ती जा रही है। ऐसे में सरकार और अदालतें इस बात की चिंता करें कि ज्यादा लोग कहीं इकट्ठा न हों और कोविड प्रोटोकाल का पालन करें तो इसका स्वागत होना चाहिए। इसीलिए जब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हर साल सावन में होने वाली कांवड़ यात्रा की खबरों का स्वत: संज्ञान लिया तो अच्छा लगा कि शायद राज्य सरकार जो खतरा नहीं देख पा रही, वह अदालत ने देख लिया। कांवड़ यात्रा 25 जुलाई से शुरू होने वाली थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह चुके थे कि पूरे कोविड प्रोटोकाल के तहत यात्रा सीमित दायरे में होगी, पर सुप्रीम कोर्ट ने दस दिन पहले ही सरकार से कहा कि पुनॢवचार कीजिए नहीं तो हम रोक देंगे। कांवड़ यात्रा रुक गई। फिर केरल सरकार ने घोषणा की कि बकरीद के लिए लोग खरीदारी कर सकें, इसलिए 18 से 20 जुलाई तक दुकानें खुलेंगी। यह एकपक्षीय न लगे, इसलिए यह भी कहा कि इस बीच हिंदू सबरीमाला मंदिर जा सकते हैं।

केरल में इस समय कोरोना के सबसे ज्यादा केस हैं। वहां संक्रमण की दर दस फीसदी है और उत्तर प्रदेश में दशमलव दो फीसदी। केरल में रोज दस हजार नए मामले आ रहे हैं और उत्तर प्रदेश में सौ भी नहीं। पूरे देश को उम्मीद थी कि बस अभी सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान लेगा और केरल सरकार को रोकेगा। किसी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और सारे तथ्य रखे। सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार से जवाब मांगा जो सोमवार देर रात आया। कहा गया कि व्यापारियों के दबाव में आदेश दिया। सवाल है कि फिर सबरीमाला में दर्शन की छूट क्यों दी? सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को सरकार को लताड़ तो लगाई, पर आदेश रद नहीं किया, क्योंकि उसकी मियाद उसी दिन पूरी हो रही थी।

मकसद इस मुद्दे के कानूनी पहलुओं पर टिप्पणी करने का नहीं है। सवाल अलग-अलग रवैये से बनने वाली आम धारणा का है। कहते हैं न्याय होना ही नहीं चाहिए, होते हुए दिखना भी चाहिए। ऐसा बार-बार क्यों होता है कि अदालतें हिंदू त्योहारों के प्रति एक रवैया अपनाती हैं और दूसरे त्योहारों के प्रति दूसरा? इसी से लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या देश में दो विधान हैं। यदि नहीं तो फिर ऐसा क्यों होता है कि एक ही कानून की जो व्याख्या हिंदुओं के मामले में प्रस्तुत की जाती है, वह दूसरे पंथों के मामले में बदल जाती है? ऐसा लगता है कि कानून के व्याख्याकार भी अपने को सेक्युलर कहने वाले दलों की ही तरह सोचते हैं। ये दल और इनके नेता हिंदुओं के खिलाफ किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। कभी भगवा आतंकवाद तो कभी सांप्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक के जरिये कहा जाता है कि दंगा होने पर हिंदू ही आरोपी होंगे और उन्हें ही साबित करना होगा कि वे निर्दोष हैं। क्या इन दलों को हिंदुओं के वोट की जरूरत नहीं? मुसलमान मतदाताओं को लुभाने के लिए क्या हिंदुओं का विरोध जरूरी है? पता नहीं पर हो तो ऐसा ही रहा है। नेता ऐसा क्यों करते हैं? अदालतें और सरकारें ऐसा क्यों करती हैं? उसकी वजह इन सबको अच्छी तरह से पता है। इस सच्चाई को जानकर ही राजनीतिक दल और नेता हिंदुओं को अपमानित भी करते हैं और वोट भी लेते हैं, क्योंकि हिंदू कभी हिंदू की तरह नहीं सोचता। वह अपनी धाॢमक अस्मिता पर जातीय अस्मिता को वरीयता देता है। वह सामान्य तौर पर जातीय पहचान के अनुरूप ही आचरण करता है। हिंदुओं के मन में अपने धर्म के प्रति एक तरह की उदासीनता का भाव है। उन्हें जाति चले जाने का जैसा दर्द या डर होता है, वैसा धर्म के चले जाने से नहीं होता। जाति से लगाव है, धर्म सामाजिकता है। जाति से प्रेम करते हैं और धर्म का निर्वाह। मुसलमान इसके ठीक उलट है। उनके लिए धर्म पर खतरा अस्तित्व पर खतरा है। वह संगठन की शक्ति को पहचानता है। इसलिए वह समाज, सरकार से लेकर न्यायालय तक ज्यादा प्रभावी है। इसलिए अदालत भी उनके बारे में किसी विषय पर विचार करते हुए यह तसल्ली कर लेना चाहती है कि इस मुद्दे पर शरिया या इस्लाम में क्या कहा गया है? संविधान की नजर में सारे नागरिक बराबर हैं, पर दोनों समुदायों के लिए उसी संविधान के प्रविधानों की व्याख्या अलग-अलग की जाती है। हिंदुओं के रीति-रिवाज पर्यावरण और लोगों की सुविधा- असुविधा की कसौटी पर कसे जाते हैं। बाकियों के रीति-रिवाज, त्योहार उनकी धाॢमक मान्यताओं की कसौटी पर। यह इस देश का न्यू नार्मल हो गया है। हमने स्वीकार कर लिया है कि यही वास्तविकता है और इसे बदला नहीं जा सकता। देश की सर्वोच्च अदालत भी हिंदुओं के बारे में कोई फैसला देती है तो संविधान की नाक की सीध में चलती है। जैसे ही मुसलमानों का मामला आता है, जज साहबान कुर्सी पर कसमसाने लगते हैं कि इस फैसले का असर क्या होगा?

भाजपा को हिंदुत्ववादी कहा जाता है। उसका मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय संस्कृति की बात करता है। हिंदू संस्कृति बोलने से बचता है। हिंदू या सनातन संस्कृति ही भारतीय संस्कृति है, यह कहना पोलिटिकली करेक्ट नहीं माना जाता। भाजपा को भी वोट हिंदू के नाम पर नहीं मिलता। उसे भी जातियों का गणित बिठाना पड़ता है। धर्म आत्मा है और राजनीति शरीर, यह बात जब तक सनातन धर्म को मानने वालों की समझ में नहीं आएगी तब तक पिटते और पिछड़ते रहेंगे। (12 सितंबर 2021, रविवार)




"अनमोल जीवन की रक्षा के लिए युवाओं की जिम्मेदारी - ईशान त्यागी"

दीपक कुमार त्यागी (पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक)

किसी प्रकार की आपदा ताकतवर से ताकतवर मनुष्य को एक ही पल में लाचार  बना देती है, लाचारी के इस भवंर को पार करने के लिए अचानक से पल भर में ही मजबूर बन चुके व्यक्ति को भी एक सहारे की आवश्यकता पढ़ती है। ठीक उसी प्रकार भयावह कोरोना काल में भी जब सरकार व सिस्टम के संसाधन लोगों की मदद करने के लिए नाकाफी साबित हो रहे थे, तो उस समय बीटेक की पढ़ाई कर चुके टीवी डिवेट में स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक की भूमिका निभाने वाले ईशान त्यागी ने अपने कुछ बेहद सच्चे हमदर्द साथियों के साथ मिलकर के जरूरतमंद लोगों की मदद करने की ठानी। उन्होंने इन लोगों की एक टीम बनाकर हिम्मत व हौसले के साथ कोरोना के मरीजों को हॉस्पिटल में एडमिशन दिलवाने से लेकर के बेड, ऑक्सीजन, आईसीयू, वेन्टीलेटर, इन्जेक्शन, दवाई व भोजन आदि की व्यवस्था करवाने का कार्य अपनी कोरोना वॉरियर्स की टीम के साथ तालमेल करके करना शुरू कर रखा है, भयावह आपदा में लोगों के जीवन को बचाने के लिए ईशान त्यागी व उनकी टीम का यह प्रयास बहुत सराहनीय है।

ईशान त्यागी बताते है कि अचानक से आयी कोरोना महामारी की जबरदस्त दूसरी लहर से भयभीत होकर अत्याधिक घबराहट व अपनों के दुनिया से चले जाने की चिंता में लोग हड़बड़ाहट में हिम्मत खो रहे है, जो इस भयंकर आपदाकाल में बिल्कुल भी उचित नहीं है, हमको इस तनावपूर्ण स्थिति से लड़कर हालात में जल्द सुधार करना है। उन्होंने बताया कि मोबाइल या सोशल मीडिया के माध्यम से उनसे या टीम के सम्मानित साथियों से जिसने भी मदद मांगी है, सबसे पहले उन लोगों ने उसका ढ़ाढस बंधाया, फिर उन्होंने इस बेहद विपरीत परिस्थिति से लड़ने के लिए उस व्यक्ति की हिम्मत व हौसले को बढ़ाने का कार्य किया, उसके बाद उन्होंने उस जरूरतमंद व्यक्ति के साथ व अपने अन्य सम्मानित सहयोगियों के सथ कंधे से कंधा मिलाकर उसकी समस्या का निदान करने का प्रयास किया, जिसके परिणाम स्वरूप अक्सर ईश्वर की कृपा व आपसी सहयोग से समस्या का समय रहते निदान हो गया। ईशान कहते हैं कि व्यक्ति को जिंदगी में विपरीत स्थिति में कभी भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, अगर वह ऐसा कर लेता है तो वह हर हाल में मुसीबत के इस किले को फतह कर ही जायेगा। ईशान त्यागी कहते है देश में आपदा के समय जैसा आजकल बेहद आपधापी का तनावपूर्ण माहौल चल रहा है, उसमें जरूरी है कि हम सभी लोगों को एकजुट होकर एक दूसरे का सहयोग करते हुए, कोरोना गाइडलाइंस का पूर्ण रूप से पालन करते हुए अधिक से अधिक  समय घर में व्यतीत करना चाहिए। ईशान कहते है कि आज के कठिन समय में बेहद जरूरी है कि देश के युवा आगें बढ़कर आये और देश व समाज के हित में पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी व दायित्वों का निर्वहन करते हुए कोरोना वॉरियर्स की जिम्मेदारी का निर्वहन करें। वैसे आजकल कोरोना की दूसरी बेहद जबरदस्त लहर की वजह से जिस तरह के हालात भारत में चल रहे हैं, उसको देखते हुए देश व समाज के हित में जरूरत है कि ईशान त्यागी जैसे योग्य मेहनतकश,  पढ़े-लिखे युवा अपनी नौकरी व्यापार के साथ-साथ समाजसेवा व राजनीति में आगें बढ़कर आये और देश व समाज को सर्वांगीण विकास के पथ पर ले जाकर सफलता की नयी राह दिखाएं। (29 अप्रैल, 2021 गुरुवार)




"विदेशी पटाखों व आतिशबाजी की बिक्री पर रोक"

डी०पी०श्रीवास्तव"अंकुर" (NNI Coverage संपादक)

देहरादून, उत्तराखंड। केंद्र सरकार के फैसले के आलोक में उत्तराखंड में भी विदेशी पटाखों व आतिशबाजी की बिक्री को राज्य सरकार प्रतिबंधित करने जा रही है। सरकार के प्रवक्ता एवं कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक के अनुसार जल्द ही इस सिलसिले में आदेश जारी किए जाएंगे। देश में विदेशी पटाखों और आतिशबाजी की बिक्री और संग्रह पर प्रतिबंध है, लेकिन जनसामान्य को इसकी जानकारी बहुत अधिक नहीं है। इसके अभाव में दीपावली के अवसर पर जाने-अनजाने व्यक्ति ऐसे पटाखे खरीद लेते हैं। इस लिहाज से देखें तो उत्तराखंड में भी दीपावली के मौके पर चीन निर्मित पटाखे और आतिशबाजी समेत अन्य सामग्री यहां पहुंचती रही है। ये आतिशबाजी अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली होती है। साथ ही इनसे खतरा भी अधिक होता है। इस सबको देखते हुए देश के अन्य राज्यों की भांति प्रदेश सरकार भी उत्तराखंड में विदेशी पटाखों व आतिशबाजी की बिक्री पर रोक लगाएगी। सरकार के प्रवक्ता एवं कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक के अनुसार इस संबंध में जल्द आदेश जारी करने के साथ ही जनसामान्य के लिए गाइडलाइन भी जारी की जाएगी।

आमजन से विदेशी पटाखे व आतिशबाजी न खरीदने और यदि कहीं इनकी बिक्री हो रही तो इसकी सूचना पुलिस-प्रशासन को देने की अपील की जाएगी। उन्होंने कहा कि ऐसी जानकारियां सामने आने पर सख्ती से कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। साथ ही विदेशी पटाखों व आतिशबाजी की बिक्री पर प्रतिबंध के मद्देनजर निगरानी सिस्टम को सशक्त किया जाएगा।सरकार के इस फैसले के धरातल पर उतरने से उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। असल में हर साल ही दीपावली के मौके पर बेतहाशा पटाखे जलाए जाने से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। शहरों व गांवों की फिजां में धुएं की धुंध परेशानी का सबब बनती है तो पटाखों के कानफोड़ू शोर से ध्वनि प्रदूषण में भी इजाफा होता है। वायु और ध्वनि प्रदूषण पर अंकुश लगाने की दिशा में सरकार का फैसला कारगर साबित हो सकता है। (रविवार, 01 नवंबर 2020)





"शिक्षा की भूमि, रण भूमि न बनें। क्या भारत फिर बनेगा विश्वगुरू?"
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
हमारा देश अपने शिक्षा कौशलों के चलते कभी दुनिया का विश्वगुरू हुआ करता था। हमारे देश में तक्षशिला, नालन्दा जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय हुआ करते थे। जहाँ से चरक और चाण्क्य जैसी विभूतियाँ निकलीं। जिनके विचारों से दुनिया आज भी प्रेरणा ले रही है। जो अन्य देशों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे। लेकिन आज देश की परिस्थितियाँ बदल गईं हैं। इन बदली परिस्थितियों के जितने जिम्मेदार देश नेता हैं, देश की राजनीति है, उतना ही जिम्मेदार हमारा समाज भी है। देश की तुष्टीकरण की राजनीति की विचारधारा ने आज इन शिक्षण संस्थानों को अखाड़ा बना दिया है। जिस शिक्षा के मंदिर में ज्ञान की ज्योति जलनी चाहिए। वहाँ देश विरोधी षड्यंत्रों की व्यूह रची जाती है। वहाँ से अफ़जल जैसे आतंकियों के लिए आवाज उठती है। वहाँ से "भारत तेरे टुकड़े होंगें" जैसी आवाज निकलती है और हमारे देश के तथाकथित कुछ बुद्धिजीवी, कुछ राजनेता उनके समर्थन में खड़े होते हैं। इस तरह ही दूषित राजनीति किसी भी देश के हित के लिए चिंताजनक है। जहाँ से चाण्क्य जैसे विचारक निकलने चाहिए, जहाँ कलाम जैसी सख्सियत निकलनी चाहिए, वहाँ से कन्हैया कुमार जैसे लोग निकल रहे हैं। सत्ता की लोलुपता में तुष्टीकरण की राजनीति ने हमेशा देश को गर्त में ही ढकेला है। देश के कुछ राजनैतिक दलों की वही नीति वही मानसकिता आज भी बनी हुई। जबकि आज देश का युवा बदलाव चाहता है। वह इन षड्यंत्रों से परे देश को फिर से विश्वगुरू बनाना चाहता है। वहीं देश के राजनेताओं को और बुद्धजीवियों को शिक्षा की भूमि को रण भूमि नही बनने देना चाहिए। (13 जनवरी 2020)




"मुस्लिम विरोधी नही, हिंदू हितैषी है यह नागरिकता बिल"
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक दोनों सदनों में बहुमत से पास कराया। इसी के साथ पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दू सहित अन्य गैर मुस्लिम समुदाय के लोगों के भारत में नागरिकता का रास्ता साफ हो गया। चूंकि देश का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था, इसलिए हमारी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हम दुनिया के पीड़ित सताये हुए हिंदुओं को अपने देश में शरण दें। पूर्व की सरकारों ने भी समय-समय पर इस प्रकार के निर्णय लिए हैं। कुछ इसी मंशा से वर्तमान सरकार ने भी इस विधेयक को सदन में पास कराया। विपक्ष अपनी स्वाभाविक रणनीति से सरकार को घेरने की कोई कोर-कसर नही छोड़ी। उसने इस बिल को मुस्लिम विरोधी, संविधान विरोधी बताकर सरकार को घेरने की निरर्थक कोशिश जरूर की, लेकिन सरकार ने तीन तलाक, 370 जैसे मुद्दों की तरह इस मुद्दे पर भी विपक्ष को करारी मात दी। इससे विपक्ष की मंशा पर सवाल तो खड़ा ही होता है, साथ ही सरकार की प्रतिबद्धता, कुशल नेतृत्व क्षमता एवं उसके कौशल का भी पता चलता है। मोदी सरकार के इस कार्यकाल में देश के गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में तीन तलाक, धारा 370 जैसे अन्य मुद्दों पर जिस तरह मजबूती से सरकार का पक्ष रखते हुए, विधेयकों को दोनों सदनों में बहुमत से पास कराया, वह उनके कुशल नेतृत्व क्षमता की मिशाल पेश करता है। इस बिल के पास होने से जहाँ एकतरफ इन तीन देशों के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता मिलेगी। वहीं दूसरी तरफ दुनिया के सामने इन देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था भी उजागर होगी। सदन में देश के गृहमंत्री ने इन देशों में अल्पसंख्यकों के जिस तरह के आंकड़े पेश किए, वह वास्तव में चिंतनीय है। इसलिए आज जो लोग यह कहकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहें कि यह बिल मुस्लिम विरोधी है। उनको यह समझना चाहिए, चूंकि देश का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था। पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान तीनों देश इस्लामिक देश बन गए और वहाँ हिंदू व अन्य अल्पसंख्यकों की संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है। वहीं भारत आज भी हिन्दू बाहुल्य देश होने के बाद भी, लोकतांत्रिक देश है। यहाँ के अल्पसंख्यकों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। उन्हें देश में समान अधिकार दिया जा रहा है। इसके बावजूद यह कहकर देश दुनिया के सामने भ्रम पैदा करना कि यह बिल मुस्लिम विरोधी है। पूर्णतः गलत है। यह बिल मुस्लिम विरोधी नही बल्कि हिंदू हितैषी है। (14 दिसंबर 2019)




"राजनीति एक अबूझ पहेली, तैयारी किसी की जश्न किसी का"
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
बेशक! दुनिया विश्वास के बलबूते चल रही है, पर 'अविश्वास' का भी अपना अलग ही विश्वास है। क्रिकेट की दुनिया में एक कहावत मशहूर है, "क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है।" यह कहावत राजनीति में भी पूरी तरह सटीक बैठती है। राजनीति भी अनिश्चितता का खेल बन चुकी है। तैयारी कोई और करता, जश्न कोई और....हालांकि इसमें स्थायित्व बिल्कुल भी नही है। आज हमारे साथ, कल आपके साथ, परसों किसी और के। ये खेल निरन्तर चलता रहता है। हाल ही में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत दिया। दोनों पुराने साथी हैं, थोड़े बहुत नखरों के बाद अमूमन इनमें समझौता हो ही जाता था। पर इस बार अपने ही अंदाज में खेल शुरू करके, शिवसेना ने इरादा ही बदल लिया। खैर बदलाव के इस मौसम में उनका बदल जाना, कोई नई बात नही। पर हिंदुत्ववादी मुखौटे को ओढ़कर, राम नाम जपने वाली शिवसेना सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर पर निर्णय आ जाने के बाद, उसका कांग्रेस और एनसीपी के साथ जाना उसके राजनैतिक भविष्य के लिए घातक हो सकता है। खैर! इन सभी घटनाक्रमों के बीच, भाजपा ने जिस नाटकीय ढंग से अजीत पवार के साथ मिलकर महाराष्ट्र में एकबार फिर सरकार बना ली। उससे यह खेल और भी रोमांटिक हो गया है। साथ ही यह भी तय हो गया, कि जम्मू-कश्मीर, बिहार, कर्नाटक और अन्य राज्यों में बीते दिनों हुए सत्ता संग्राम की तरह महाराष्ट्र में भी सत्ता संग्राम अभी थमने वाला नही है। इन सभी घटनाक्रमों को देख कर यह कहना भी विल्कुल गलत नही होगा, कि  "राजनीति एक अबूझ पहेली है।" (24 नवंबर 2019)




ट्रैफिक पुलिस को बहुत बहुत बधाई! लेकिन . . . . !
जैमिन डेव, अभिनेता/समाजसेवी (राजस्थान)
दस गुना नहीं पचास गुना चालान कर दो, यातायात पुलिस नये नियमों का जोरदार बखान कर रही है, पुरे शहर में चालान बनाने के लिये बडे बडे खंभों को कैमरों से लाद दिया है। लोगों को समाचार पत्रों के माध्यम से हिदायत दी जा रही है की ट्रैफिक नियम तोड़ा तो दस गुना जुर्माना होगा, बहुत खुशी की बात है। परंतु साहब जनता को खुशी ज्यादा तब होती जब आप साथ में इतना और बोलते कि चोरी होने पर इन कैमरों के माध्यम से चोरों को रंगे हाथों पकड लिया जायेगा, चेन स्नेचिंग होने पर तुरंत लुटेरों को पकड लिया जायेगा, किसी लडकी से छेड़छाड़ होने पर अपराधी को तुरंत पकडा जायेगा, व्यापारी से लूटपाट होने पर चंद घंटों में अपराधी व पैसे को ढूंढ लिया जायेगा।
         जितना उत्साह सड़क पर लोगों का चालान बनाने का है उतना उनकी सुरक्षा का भी होता तो मजा दोगुना हो जाता। और साथ ही पुलिस विभाग सड़कों पर गड्ढे, आवारा पशुओं और अतिक्रमण हटाने या इनसे संबंधित एजेंसियों पर भी भारी जुर्माने का प्रावधान रखती तो मजा तिगुना हो जाता। (01 सितंबर 2019)




देश की उम्मीदें : देश मे बदलाव और सशक्तिकरण
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
कल के अंक में देश के गृहमंत्री जी का एक सारगर्भित लेख ''मजबूत इच्छशक्ति से बदलाव लाते मोदी'' ने सरकार के कार्यों एवं सरकार की नीतियों को पूरी तरह स्पष्ट किया। निःसंदेह, वर्ष 2014 से मोदी जी की सरकार ने देश हित में, समाज हित में कई साहसिक निर्णय लिया है। चाहे वह जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाकर अखण्ड भारत के सपने को साकार करना हो, या फिर तीन तलाक पर कानून के जरिये समाजिक कुरीति को मिटाकर महिलाओं के शशक्तिकरण पर जोर देना हो। इन साहसिक फैसलों ने ही मोदी जी की विश्वनीयता व उनकी स्वीकार्यता को मजबूती प्रदान की है। मोदी जी के कुशल साहसिक नेतृत्व के कारण ही आज भारत विश्व पटल पर मजबूती से स्थापित हो चुका है। बेशक मोदी सरकार ने तमाम मुद्दों पर निर्णायक कार्य किया है, पर कुछ मुद्दे जैसे- जनसंख्या नियंत्रण पर कानून, समान नागरिक संहिता एवं कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली का मुद्दा आज भी सरकार के ध्यानाकर्षण का इंतजार कर रहे हैं। मोदी जैसे शशक्त एवं दूरदर्शी प्रधानमंत्री से देश को इन मुद्दों निर्णय की उम्मीद है। (25 अगस्त 2019)




परिवारवाद की गिरफ्त में कांग्रेस, राष्ट्रवादी है भाजपा
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
बदलते राजनीतिक परिदृश्य में, देश का आम जनमानस जहां राजनीति में परिवारवाद एवं जातिवाद को नकार रहा है, वहीं देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी, एकबार फिर परिवारवाद की गिरफ्त से बाहर नही निकल पाई। एक तरफ जहां भाजपा परिवारवाद से विरक्त राष्ट्रवाद के मुद्दे पर देश दुनिया में अपनी नई ताकत, नई पहचान बना रही। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस फिर से परिवारवाद में जकड़ गई। वैसे कांग्रेस का इतिहास ही परिवारवादी है, पर लगातार दो लोकसभा चुनाव हारने के बाद और इस प्रचण्ड मोदी लहर में भी पंजाब में पार्टी को बहुमत दिलाने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी पार्टी की कमान युवा हाथ में देने की वकालत के बाद ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस पुरानी बेड़ियों को तोड़ेगी, अगर ऐसा होता तो कांग्रेस पार्टी की स्थिति कुछ और हो सकती थी, पर ऐसा नही हुआ। मोदी और शाह की सशक्त जोड़ी जहां एकतरफ अपने साहसिक निर्णयों से देश का विश्वास व भरोस जीत रही है, वहीं दूसरी तरफ एकबार फिर परिवारवाद से बाहर न निकल के कांग्रेस ने अपने ही फैसले से अपने खिलाफ अविश्वास पैदा कर लिया है। (12 अगस्त 2019)



370/35A पर भारतीय इतिहास का स्वर्णिम फैसला 
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
किसी ने सही ही कहा है कि मान लो तो हार है और ठान लो तो जीत। मोदी और शाह की अद्भुत जोड़ी ने अपनी दृढ़संकल्प शक्ति और साहस का परिचय देते हुए, भारतीय इतिहास के पन्नो पर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करा लिया। भारतीय इतिहास के तत्कालीन राजनेताओं की सोची समझी साजिश को झेल रहे जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटने व जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश तथा लद्दाख को अलग करते हुए केंद्र शासित प्रदेश बनाने के निर्णय का आज पूरा देश स्वागत कर रहा है। करे भी क्यों न,आखिर धरती का स्वर्ग जम्मू कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग होकर भी भारत का नही था। वहां का अलग संविधान, अलग विधान एवं अलग निशान भला किस भारतीय के गले उतरता रहा होगा? मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले ने मोदी सरकार की विश्वनीयता को और मजबूती प्रदान की है, राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद सरकार ने जिस तरह से इस बिल को दो तिहाई बहुमत से पास कराया, वह उनके राजनैतिक कुशलता का प्रमाण देती है। धारा 370 हटना देश के लिए एक सपने जैसा था और इस सपने को मोदी और शाह की जोड़ी ने पूरा करके, पूरे देश को तो गौरान्वित किया ही है, साथ ही उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल और भाजपा संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि भी अर्पित की है। निश्चित ही यह एक साहसिक निर्णय है,धारा 370 हटने से जहाँ एक तरफ जम्मू कश्मीर विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा, वहीं दूसरी तरफ वहाँ से आतंकवाद का सफाया भी होगा। कहीं न कहीं जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा, पाकिस्तान और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला था। निश्चित ही सरकार के इस फैसले से पाकिस्तान, अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों की कमर दूटेगी और अभी तक मुख्यधारा से वंचित जम्मू कश्मीर और लद्दाख भी भारत के अन्य राज्यों की तरह विकास की राह पर आगे बढ़ेगा। वहां भी खुशहाली एवं शांति का माहौल होगा। सरकारों से ऐसे ही निष्पक्षता की उम्मीद होती है,जो पहले की सरकारें नही कर पायीं। अखण्ड भारत की परिकल्पना को पूरा करने के लिए मोदी सरकार का विशेष आभार। (7 अगस्त 2019)



"नारी का सम्मान हो तो देश का उत्थान हो : रवि शुक्ल"
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
कहा गया है कि, ''नारी का सम्मान जहाँ है संस्कृति का उत्थान वहाँ है"। हमारी भारतीय संस्कृति में नारी को श्रेष्ठ सम्मान दिया जाता है। आज देश की प्रगति में नारियों का योगदान अतुलनीय है। हर क्षेत्र में देश की नारियां अपना परचम लहरा रही हैं। ऐसी परिस्थिति में हम यदि उनके लिए द्वेयम दर्जे का दृष्टिकोण रखते हैं, तो यह कतई उचित नही है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के चर्चित नेता ने संसद में एक अशोभनीय टिप्पणी कर संसद की गरिमा को शर्मसार कर दिया है। देश के सर्वोच्च सदन में इस तरह की टिप्पणी बेहद निन्दनीय है। हालांकि ऐसे अमर्यादित बयान के लिए वो जाने जाते है, लोकसभा के चुनाव के दौरान भी उन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी, महिला प्रत्याशी पर अशोभनीय टिप्पणी की थी। जिस मामले में उनके खिलाफ चार्जशीट भी लग चुकी है। सदन में भी सांसदों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, न्याय की मांग हो रही है। देश का उच्च सदन जहाँ से देश की जनता को अपार उम्मीदें रहती हैं। वहां इस प्रकार की परिस्थिति उत्पन्न करना देश के लिए चिंता जनक है। देश की संसद में इस प्रकार की हरकत कर, सदन को वास्तविक मुद्दों से भ्रमित करने वालों की खिलाफ कठोर से कठोर कार्यवाही होनी चाहिए और देश की जनता को ऐसे असभ्य लोगों का बहिष्कार करना चाहिए। (28 जुलाई 2019)




"भारत की बड़ी जीत, पाक का नापाक चेहरा दुनिया के सामने"
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
पाकिस्तानी सरकारें सैन्य ताकतों का सहारा लेकर देश में आतंक को पनाह देती रही हैं, और इस बात को दुनिया के सामने छुपाने के लिए, वह दूसरे देश के निर्दोष लोगों पर फर्जी आरोप लगाकर उनको बन्दी बनाकर, दुनिया के सामने खुद की करतूतों को छुपाने का प्रयास करती है। इसी कड़ी में जासूसी और आतंकवाद का आरोप लगाकर पाक की सैन्य अदालत ने भारत के जांबाज पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को फांसी की सजा सुनाई थी। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने इस फैसले को खारिज कर दिया जिससे दुनिया के सामने पाकिस्तान का नापाक चेहरा एकबार फिर उजागर हो गया। आतंकवाद को लेकर पिछले चार पांच वर्षों से भारत ने दुनिया के सामने पाकिस्तान को बेनकाब करने का कोई मौका नही छोड़ा है। इस कड़ी में अंतरराष्ट्रीय अदालत का यह फैसला भारत के लिए एक बड़ी जीत है। हालांकि पहले भी पाकिस्तान ने कई ऐसी हरकतों को अंजाम दिया है, जिससे उसकी नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगे हैं। कई वर्षों तक पाकिस्तान की हिरासत में रहने वाले भारत के सरबजीत की पाकिस्तान की जेल रहस्यमयी मौत पाकिस्तान की नापाक नीतियों का प्रमुख उदाहरण है। आज दुनिया जहाँ एक तरफ शांति और अपने देश की उन्नति का मार्ग अपना रही है। वहीं पाकिस्तान की आतंक परस्त नीति उसे काफी पीछे ढकेल चुकी है। उम्मीद है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को गम्भीरता से लेकर पाक अपने रवैये में सुधार करेगा नही तो वह दिन दूर नही जब पाकिस्तान बर्बादी की कगार पर खड़ा होगा और दुनिया का कोई भी देश उसकी तरफ हाथ बढ़ाने को तैयार नही होगा। (18 जुलाई 2019)



"लोकतंत्र का सम्मान हो, तो देश का सम्मान हो!"
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
लोकतंत्र हमे महान बनाता है, हमारी विशेषता और जनभावनाओं के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है। निजी स्वार्थ को त्याग हम सभी को लोकतंत्र का सम्मान करना चाहिए। हम कोई गलती करती हैं और उसकी सजा हमे मिल जाय तो हम गैरों पर दोष लगाने लगते, यह गलत है। हमारे अंदर स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए। पिछले चार पांच वर्ष से स्वहित के चक्कर में आरोपों का जो दौर शुरू हुआ है वह निंदनीय है। हाल ही में लोकसभा चुनाव सम्पन्न हुए और टीवी चैनलों ने एक्ज़िट पोल में एनडीए की सरकार बनने की बात कही, सरकार किसकी बनती है अलग बात है! पर उसके बाद विपक्ष के नेताओं का जो आरोपों का दौर जो बयानबाज़ी शुरू हुई है वह बेहद ही चिंताजनक है सारे विपक्ष के नेता एक सुर में ईवीएम पर सवाल खड़ा कर रहे हैं कोई ईवीएम बदलने की तो कोई चुनाव परिणाम बाद खून खराबे तक कि बात कर रहा है....इन बयानों से उनकी उनकी क्षमताओं का पता चलता है, जब आप यह कहते हैं कि अगर जीतें तो सब सही और अगर भाजपा जीते तो ईवीएम से छेड़छाड़, यह सरासर जनादेश का अपमान है। आप जब दिल्ली जीतते हैं, आप जब पंजाब जीतते हैं, आप जब कर्नाटक जीतते हैं, आप जब मध्यप्रदेश राजस्थान छत्तीसगढ़ जीतते हैं, तब ईवीएम सही रहती। पर जब आप हारते हैं, तो ईवीएम खराब। ईवीएम से छेड़छाड़, यहाँ तक की आप देश की संवैधानिक संस्थाओं पर न्यायपालिका पर भी आरोप लगा सकते हो। यह सरासर देश की जनता का अपमान है। मैं व्यक्तिगत तौर पर सभी नेताओं को सलाह देना चाहता हूँ, अपने अंदर स्वीकार की भावना लाएं और देश की जनता के जनादेश और देश के लोकतंत्र का सम्मान करें। (26 मई 2019)



"लोकतंत्र को शर्मसार करतीं पश्चिम बंगाल की घटनाएं"
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0। 
            आरोप-प्रत्यारोप की बात अलग है, इस लोकसभा चुनाव में भले ही नेताओं की जुबानी जंगों ने मर्यादाओं को ताक पर रखा हो। पर पूरे देश में चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो रहे थे, हमने देखा है.. उत्तर प्रदेश के जो बूथ 2017 से पहले अति संवेदनशील हुआ करते थे, उच्च कोटि की सुरक्षा व्यवस्था प्रदान करनी पड़ती थी। वहाँ भी इस बार सामान्य सुरक्षा व्यवस्था में ही चुनाव बेहद शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो गए हैं। देश का सबसे अतिसंवेदनशील प्रदेश जम्मू कश्मीर, ने भी इस इस लोकसभा के चुनाव में देश को शान्ति का सबक दिया है, लेकिन इन सबको दरकिनार करते हुए पूरे देश की कोर कसर इस बार पश्चिम बंगाल में निकल रही है, जिस शांति, अराजकता की बात करके ममता बनर्जी सत्ता में आयीं थी, आज सत्ता की ललक में उसी शांति व्यवस्था को ताक पर रख दिया है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और यह लोकतंत्र की ही देन है कि एक गरीब परिवार में जन्म लेने वाले नरेंद्र मोदी  इस देश प्रधानमंत्री हैं, यह लोकतंत्र ही देन है ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। अगर लोकतंत्र न होता तो शायद ये लोग इतने उच्च पदों पर आसीन होते? आज उसी लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं? अरे! आप लोग यह क्यों भो रहे? इसी लोकतंत्र के बलबूते जनता ने बड़ी से बड़ी शख्सियत को धूल चटा दिया है। इसलिए कुर्सी पर रहते हुए उसके उपयोग सदुपयोग का ध्यान रखो, पश्चिम बंगाल में चुनाव की सर गर्मी के बीच जिस तरह की घटनाएं पिछले दिनों घटित हुई हैं, चाहे वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर न उतरने देना हो या जय श्रीराम के नारे लगाने वाले युवाओं को गिरफ्तार करवा लेना हो, अन्यन्य..घटनाओं ने पश्चिम बंगाल में जो एक तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न की है, वह चुनाव तक ही नही चुनाव के बाद भी एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए किसी खतरे से कम नही है। ऐसी घटनाओं ने देश के लोकतंत्र को शर्मसार ही किया है। (18 मई 2019)




"देश ने अपनी ताकत का एहसास कराया, दृढ़ इच्छाशक्ति से सबकुछ संभव" 
रवि शुक्ल (शिक्षक/समाजसेवी) बहराइच, उ0प्र0।
                 किसी भी जंग को जीतने के लिए संसाधनों के साथ-साथ दृढ़ इच्छाशक्ति की भी आवश्यकता होती है। पिछले कई वर्षों से देश ने जिस मजबूती के साथ दुश्मन को जवाब दिया है, उसने दुनिया के सामने देश की सैन्य ताकतों के साथ-साथ मजबूत राजनीति का भी उदाहरण प्रस्तुत किया है। देश में आतंकी हमले पहले भी हुए हैं, हमने 26/11 भी झेला है, लेकिन उस समय की लचर कार्यवाही ने तत्कालीन नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। आतंकी हमलों से देश आहत आ चुका है। पुलवामा हमले ने तो देश को हिला कर रख दिया था। देश शहीदों की शहादत का बदला चाहता था। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पर दबाव जरूर बनाया, पर पाकिस्तान ने हमेशा की तरह इस बार भी अपनी गलती स्वीकार नही की। लेकिन अब भारत बदल चुका है, वह मजबूत स्थिति में किसी भी घटना से निपटने के लिए प्रबल इच्छाशक्ति साहस रखता है। उसका सफल नमूना वायुसेना ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी कैम्पों को तबाह कर के पेश किया है। 
                 मोदीजी के कार्यकाल की यह दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक है। इन जवाबी हमलों ने दुनिया के सामने एक मजबूत भारत की तस्वीर पेश की है। हमने दुनिया को दिखा दिया है कि हम शान्ति भी चाहते हैं, और अगर कोई हमारे देश की तरफ आंख उठा कर देखता है, तो उसकी आंख निकालना भी जानते हैं। जैसा कि मोदीजी ने राजस्थान की धरती से कहा कि, 'मैं देश नही झुकने दूँगा, मैं देश नही मिटने दूँगा'। यह सर्जिकल स्ट्राइक उसी का उदाहरण है। भारत जहाँ एक तरफ चुनाव की दहलीज पर खड़ा है, वहाँ मोदी सरकार की इस सर्जिकल स्ट्राइक ने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया है। इससे हमारी सेना की ताकत का एहसास भी हुआ और सेना का मनोबल भी बढ़ा है और देश को अपनी सेना पर गर्व भी। आज देश, दुनिया ने हमारी सेना के साथ-साथ मोदी जी की इच्छाशक्ति का भी लोहा माना है। देश ने पाकिस्तान को अपनी ताकत का एहसास करा दिया है। (27 फरवरी 2019)




"बजट का खुला पिटारा, वेतनभोगियों को हरी झंडी, मध्यम वर्ग मरने की कगार पर" 

ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव, सहसंपादक NNI Coverage

मोदी सरकार ने आसन्न आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपने अंतिम बजट में किसानों, असंगठित मजदूरों, वेतनभोगियों और व्यापारियों के लिए सौगातों का पिटारा खोलते हुए राहतों की झड़ी लगा दी, लेकिन मध्यम वर्ग को फिर से शायद मरने की कगार पर पहुंचना पड़ेगा। हालांकि वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को लोकसभा में वर्ष 2०19-2० का अंतरिम बजट पेश किया, जिसमें विपक्ष से किसानों का मुद्दा छीनते हुए छोटी जोत वाले और सीमांत किसानों को हर वर्ष 6,००० हजार रुपये देने, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए नई पेंशन योजना, वेतनभागियों के लिए पांच लाख रुपये तक की आय को कर मुक्त बनाने और पांच करोड़ रुपये का कारोबार करने वाले व्यापारी वर्ग को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) रिटर्न भरने में राहत की घोषणा की गई है। इन कारोबारियों को अब हर माह के बजाय तीन माह में जीएसटी रिटर्न भरनी होगी। श्री गोयल ने बजट पेश करते हुये कहा कि किसानों को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना चालू वित्त वर्ष से शुरू की जा रही है। इसके लिए अभी 2० हजार करोड़ रुपये और अगले वित्त वर्ष के लिए 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना से करीब 12.5 करोड़ छोटे किसानों को लाभ होगा। यह राशि दो-दो हजार रुपये की तीन किस्तों में सीधे किसानों के बैंक खाते में हस्तांतरित की जायेगी। उन्होंने कहा कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना शुरू की जा रही है। अट्ठारह से 4० वर्ष आयु वर्ग के कामगार इससे जुड़ सकते हैं, जिन्हें तीन हजार रुपये मासिक पेंशन दी जायेगी। इसमें जिनती राशि कामगार देगा सरकार भी उतनी ही राशि जमा करेगी। इस योजना में घरेलू कामगार को भी शामिल किया गया है। यह 15 फरवरी से शुरू हो जायेगी और सरकारी जीवन बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) इस योजना के लिए क्रियान्वयन एजेंसी होगी। श्री गोयल ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति 18 वर्ष की आयु में इस योजना को अपनायेगा तो उसे मासिक 55 रुपये का भुगतान करना होगा और 29 वर्ष के व्यक्ति को इसके लिए करीब 1०० रुपये प्रति माह देना होगा। बजट पेश करने के बाद संवाददाताओं से चर्चा में उन्होंने कहा कि अंतरिम बजट की एक मर्यादा होती है और इसके मद्देनजर आयकर के स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है। सिर्फ नये मध्यम वर्ग को राहत पहुँचाते हुये उसे पाँच लाख रुपये की शुद्ध वार्षिक आय पर कोई कर नहीं देने का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि डेढ़ लाख रुपये तक के निवेश, आवास ऋण पर दो लाख रुपये तक के ब्याज भुगतान, मानक कटौती, बच्चों की शिक्षा के लिए ऋण पर ब्याज भुगतान आदि में मिलने वाली छूट के बाद पाँच लाख रुपये तक की आय वालों को कोई कर नहीं देना होगा। श्री गोयल ने कहा कि वेतनभोगियों के लिए ग्रेच्युटी की सीमा 1० लाख रुपये से बढ़ाकर 2० लाख रुपये कर दी गयी है। पाँच लाख रुपये तक की सालाना आय वालों को आयकर में शत-प्रतिशत छूट दी गयी है। इसके अलावा डेढ़ लाख रुपये तक के निवेश की छूट भी होगी। जो आयकर दाता भविष्य निधि समेत 8० (सी) के तहत अन्य छूट योजनाओं में डेढ़ लाख रुपये तक का निवेश करेगा उसे डेढ़ लाख रुपये तक अतिरिक्त कर लाभा मिलेगा। बजट प्रावधान से पाँच लाख रुपये तक की सालाना आय के करदाता को साढ़े बारह हजार रुपये का लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि सरकार के इस फैसले से मध्यम वर्ग के करीब तीन करोड़ आयकर दाता कर के दायरे से बाहर हो जायेंगे। वेतनभोगियों के लिए मानक कटौती को 4० हजार रुपये से बढ़ाकर 5० हजार रुपये किये जाने की घोषणा की गयी है। बैंक और डाकघर में जमा राशि पर मिलने वाले 4० हजार रुपये तक के ब्याज पर अब स्रोत पर कर नहीं कटेगा। वर्तमान में यह छूट 1० हजार रुपये तक थी। इसी प्रकार किराये से होने वाली 2.4० लाख रुपये तक की आय स्रोत पर कर कटौती के दायरे से बाहर होगी। फिलहाल यह 1.8० लाख रुपये तक थी। श्री गोयल ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रारंभ से ही जीएसटी में सुधार की प्रक्रिया शुरू की गयी थी और अब तक करीब 4०० वस्तुओं पर जीएसटी दरों में कमी की गयी है जिससे आम उपभोक्ताओं को 8० हजार करोड़ रुपये की बचत हुई है। दरों में छूट के बावजूद जीएसटी राजस्व संग्रह में तेजी का रुख बना हुआ है और इस वर्ष जनवरी महीने में जीएसटी राजस्व संग्रह एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुँचने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि जीएसटी के तहत पाँच करोड़ रुपये तक के कारोबारियों को जल्द ही तिमाही रिटर्न भरने की सुविधा दी जायेगी। अंतरिम बजट में खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम पदार्थों समेत कुल सब्सिडी करीब 12 प्रतिशत बढ़कर तीन लाख 34 हजार 235 करोड़ रुपये पर पहुँचने का अनुमान व्यक्त किया गया है। सब्सिडी का चालू वित्त वर्ष के संशोधित बजट अनुमान दो लाख 99 हजार 21० करोड़ 61 लाख रुपये की तुलना में 11.7० प्रतिशत अर्थात 35०13.96 करोड़ बढ़कर 334234.57 करोड़ रुपये पर पहुँच जाने का अनुमान है। वर्ष 2०18-19 के बजट में 295496.86 करोड़ रुपये की सब्सिडी का अनुमान लगाया गया था। वित्त मंत्री ने कहा कि मुद्रा योजना के तहत अब तक 15.56 करोड़ ऋण दिये गये हैं और इन ऋण खातों में 7,23,००० करोड़ रुपये की राशि जारी की गयी है। उन्होंने कहा कि भारत भी दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ सर्वाधिक संख्या में युवा आबादी है। अंतरिम बजट में भारतीय रेलवे को वर्ष 2०19-2० में मालभाड़े एवं यात्री किराये में क्रमश: 9.2 और 7.7 प्रतिशत का इजाफा होने के बावजूद परिचालन अनुपात में केवल 1.2 प्रतिशत का सुधार होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। वर्ष 2०19 में रेलवे के बजट में यातायात से कुल आय वर्ष 2०18-19 के संशोधित अनुमान एक लाख 88 हजार 8०० करोड़ रुपये की तुलना में दो लाख पाँच हजार 5०० करोड़ रुपये होने का अनुमान है जबकि परिचालन व्यय एक लाख 96 हजार 714 करोड़ रुपये की तुलना में दो लाख 16 हजार 675 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने वर्ष 2०19-2० के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए तीन लाख पाँच हजार 296 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। अंतरिम बजट में रक्षा बजट के लिए 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन किया है। वर्ष 2०18-19 में रक्षा क्षेत्र के लिए दो लाख 95 हजार 511 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। यह राशि केन्द्र सरकार के कुल खर्च का 12.1० फीसदी थी। इसमें से एक लाख 95 हजार 947 करोड रुपये नेट एक्सपेंडिचर और 99 हजार 536 करोड रुपये पूँजीगत व्यय के लिए निर्धारित किये गये थे। इससे पहले वर्ष 2०17-18 में रक्षा क्षेत्र के लिए दो लाख 79 हजार करोड रुपये का प्रावधान किया गया था। भूतपूर्व सैनिकों की 'एक रैंक एक पेंशनÓ (ओआरओपी) के तहत सरकार अब तक 35 हजार करोड़ रुपये भूतपूर्व सैनिकों को दे चुकी है। अंतिरम बजट में कहा गया है कि भारत मोबाइल डाटा का सर्वाधिक उपयोग करने वाला देश बन गया है और इस पहचान को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए पाँच साल में एक लाख गाँवों को डिजिटल किया जाएगा। (02 फरवरी 2019)



"बेरोजगारी के संकट से जूझ रहा अपना भारत"

ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव, सहसंपादक (NNI Coverage)
देश में रोजगारविहीन वृद्धि का दौर लंबे समय से चल रहा है, जिसकी वजह से अपना भारत बेरोजगारी के संकट जूझ रहा है लेकिन सरकार और उद्योग जगत द्वारा प्रयासों के दावे के बावजूद हालत चिंताजनक है। केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने विश्व श्रम संगठन के हवाले से संसद को बताया है कि इस वर्ष बेरोजगारों की संख्या 1.86 करोड़ हो सकती है, जो बीते साल 1.83 करोड़ थी. इसका मतलब यह है कि बेरोजगारी की दर 3.5 फीसदी के स्तर पर स्थिर रह सकती है। लेकिन, क्या इन अनुमानों से पूरी तरह आश्वस्त हुआ जा सकता है?  भारतीय अर्थव्यवस्था का अध्ययन करनेवाली प्रतिष्ठित संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट कहती है कि फरवरी में बेरोजगारी पिछले 15 महीनों के उच्चतम स्तर पर थी। इसके मुताबिक बेरोजगारों की मौजूदा संख्या 3.10 करोड़ है, जो कि अक्तूबर, 2016 के बाद सर्वाधिक है। इस हिसाब से फरवरी में बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी रही है, जबकि जनवरी में यह दर पांच फीसदी थी। मौजूदा वित्त वर्ष में करीब छह लाख रोजगार सृजन का आकलन है। चिंता की बात यह है कि बेरोजगारी की दर में कमी की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। पिछले माह केंद्र सरकार ने जानकारी दी थी कि मार्च, 2016 तक उसके चार लाख से अधिक पद खाली हैं, जो कि केंद्रीय विभागों के कुल कार्य-बल का 11 फीसदी है। जब 1.70 करोड़ लोग हर साल रोजगार के लिए तैयार हो रहे हैं और करीब 55 लाख नौकरियां ही उपलब्ध हो रही हैं, तो सरकार को अपने अधीन खाली पदों को भरने पर जोर देना चाहिए। याद रहे, सितंबर, 2015 तक ही साढ़े चार करोड़ लोग रोजगार केंद्रों में पंजीकृत थे। अब यह संख्या बढ़ी ही होगी तथा बड़ी संख्या में बेरोजगार पंजीकरण भी नहीं कराते हैं। रोजगार के संदर्भ में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने व्यक्ति की क्षमता और कौशल से निम्न स्तर के रोजगार में लगे होने की अहम समस्या को रेखांकित किया है, परंतु इसे बेरोजगारी से अधिक बड़ी समस्या कहना सही नहीं है। बहरहाल, विभिन्न आर्थिक सुधारों और अर्थव्यवस्था की मजबूती के भरोसे यह माना जा सकता है कि आनेवाले समय में हालत बेहतर हो सकती है। सरकार ने राष्ट्रीय रोजगार नीति तैयार करने के लिए मंत्रियों की एक समिति गठित की है। साथ ही, व्यापक आंकड़े जुटाने की दिशा में भी कोशिशें जारी हैं। संपत्ति के सृजन और आर्थिक वृद्धि के संतोषजनक रहने की स्थिति को तभी सकारात्मक माना जा सकता है, जब रोजगार के अवसर भी समुचित संख्या में पैदा होते रहें। उत्पादन और मांग को गति देने के लिए जरूरी है कि आम लोगों की आमदनी बढ़े। अगले साल के पूर्वार्द्ध में लोकसभा के चुनाव होने हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के पास बेरोजगारी की समस्या के समाधान हेतु ठोस पहल करने के लिए बहुत अधिक समय नहीं बचा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस मुद्दे पर संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श कर जल्दी ही कोई बड़ा नीतिगत फैसला लेगी। (15 अक्टूबर 2018)

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